Sunday, January 8, 2012

तुम....
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तुम
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लिखती हुं !
लिखती रहेती हुं!
पर क्या लिखुं?
तुम्हे जोडा रोज़,
आकाश से ,
सुरज से,
हवांओसे ,
यहां तक की,
हर एक ऋत के पल के साथ ,
पर तुम हो की,
जोडना मुज़से तुम्हारा खतम नही होता!
सोचा की तुम्हे याद कैसे रखुं?
और भूलुं भी तो कैसे??
तुम...
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हां तुम,
एक रुप नही हो,
की मिटेगा कभी !
एक पल नही हो,
जो दुसरा पल चून लूं!
तुम्,
जैसे बहेती धारा हो,
जिसमे मै सिर्फ बहेती रहूं,
और बस,
फैलती हुं तुम्हारी बांहो मे!
ना याद करना ,
ना मिटाना,
सिर्फ, तुम जो हो,
तुम मे जींदा रहुं !
तुम...
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क्या मैं कभी लिख पाऊगी तुम्हे!!
तुम!
**ब्रिंदा**

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